दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी, अखियाँ प्यासी रे।
मन मंदिर की ज्योत जगा दो, घट घट वासी रे।
मंदिर मंदिर मूरत तेरी, फिर भी न दीखे सूरत तेरी।
युग बीते न आये मिलन के, पूरण वासी रे।
द्वार दया का जब तू खोले, पंचम सुर में गुँगा बोले।
अंधा देखे लंगड़ा चलकर, पहुँचे काशी रे।
पानी पीकर प्यास बुझाँऊ, नयनन को कैसे समझाऊँ।
आँख मिचौली छोड़ो अब तो, मन के वासी रे।
लाज न लूट जाए मेरी, नाथ करो न दया में देरी।
हम सब की ये विनती सुनलो, गोकुल वासी रे।
दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी.............
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